Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verses 27–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

चिद्व्योम्ना काचकच्यं स्वं सर्गादौ व्योम्नि चेतितम् । जगदित्येव निर्मूलं काकतालीयवत्स्वयम् ॥ २७ ॥ निर्मूलमेव भातीदमभातमपि भातवत् । तस्माद्यद्भासुरमिदं तत्तदेव पदं विदुः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि स्पष्ट अनुभव होने के कारण सत्यता को प्राप्त हुए जगत्‌ की ज्ञानमात्र से कैसे असत्वापत्ति हो सकती है 2 इसपर कहते है । जैसे अपने स्वप्नसमय में स्पष्टरूप से अनुभव में आया हुआ भी स्वाप्न जगत्‌ प्रबोध से (जागने से) असत्य ही हो जाता है वैसे ही चिदाकाश मे अनुभूयमान भी यह सर्गसंवित्‌ तत्त्वज्ञान से केवल शून्य ही रह जाती हे