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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

स्वधर्मव्यवहारेण यदायाति तदेव मे । रोचते नान्यदित्येव पदे वज्रदृढीभव ॥ ११ ॥ संवित्प्रवृत्तिमर्थेषु विरुद्धेषु विवर्जयन् । अर्जयञ्छमसंतोषौ यः स्थितः स जितेन्द्रियः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

देह में आत्मभ्रान्ति ही सव दुःखो का मूल है, ऐसा कहते हैं। यह केवल तुच्छ शरीर एकमात्र भ्रान्तिरूप असत्यमय हे । पिशाचभ्रम दर्शन की भाँति यह अत्यन्त दुःखदायक हे । जो मनोराज्य की तरह असत्य है, जो पत्तों के छोर पर लटक रहे जलबिन्दु की तरह चंचल (क्षणभंगुर) है ओर पूर्वोक्त विद्वान ओर अविद्वान की अनुभूति द्वारा भी विचारा जा रहा जो असत्‌ है उसमें आत्मता का प्रसंग क्या ? यानी उसमें कदापि आत्मता का संभव नहीं हे