Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
संवित्प्रयत्नसंबोधनिशिताङ्कुशकर्षणैः ।
मनोमतङ्गजं मत्तं जित्वा जयति नान्यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रमा की प्रादेशिकता यानी चन्द्रमा केवल वित्ताभर है यह जैसे चन्द्रमण्डल के विस्तार को
जाननेवालो के अनुभव से मेल न खाने के कारण असत् है वैसे ही ज्ञानियो के अनुभव से विरुद्ध होने के
कारण भी जगत् असत् है, ऐसा कहते हैं।
सत्य-असत्यमय सर्ग (सृष्टि) तत्त्वज्ञानियों द्वारा जैसा ज्ञात है वह मूर्खो की दृष्टि में असत् है
एवं मूर्खो द्वारा जैसा ज्ञात है वह तत्त्वज्ञानियों की दुष्टि में असत् है । अथवा ऐसा अर्थ करना
चाहिये - मूर्खो ओर तत्त्वज्ञानियों के अनुभव का अनुसरण कर प्रपंच की व्यवस्था नहीं की जा
सकती, क्योंकि उन दोनों में परस्पर विसंवाद होने से-जमीन आसमान सी विपरीतता होने से-उन
दोनों को ही वह अज्ञात है