Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verses 18–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verses 18–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 18-25
संस्कृत श्लोक
अचेत्यमेव चिन्मात्रमिदं जगदिति स्थितम् ।
इत्येव सत्यबोधस्य बन्धमोक्षदृशौ कुतः ॥ १८ ॥
अनाकारं यथा वारि क्षीणं वहति नो पुनः ।
अकारणं तथा दृश्यं ज्ञानच्छिन्नं न रोहति ॥ १९ ॥
वेदनं व्योममात्रं त्वमहमित्यादिरूपधृक् ।
वर्जयित्वैतदन्यत्स्यादहमित्यादिकं जगत् ॥ २० ॥
अविद्यामात्रमेवेदमहमित्यादिकं जगत् ।
चिद्व्योम्न्येव स्थितं शान्तं शून्यमात्रशरीरकम् ॥ २१ ॥
इदं चिद्व्योम्नि चिच्छाया जगदित्येव भासते ।
शून्यशून्यैव चिच्चासौ शून्या चेत्येव निश्चयः ॥ २२ ॥
स्वप्नदर्शनदृष्टान्तः केन नामात्र खण्ड्यते ।
असन्मयोऽनुभूतश्च स्वानुभूतोऽप्यसन्मयः ॥ २३ ॥
सोऽङ्ग संवित्तिमात्रात्मा यद्यद्राज्यं महीयते ।
नकर्तृकर्मकरणं रूपं तद्वज्जगच्चितेः ॥ २४ ॥
अकर्तृकर्मकरणमहं चिद्धनमात्रकम् ।
जगच्चेदमनिर्देश्यं स्वसंवेदनलक्षणम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव आत्मविचार से अपना उद्धार कीजिये, ऐसा कहते हैं।
निस्सन्देह जीव आप ही अपना बन्धु है और आप ही अपना शत्रु हैं। अपने से अपनी रक्षा न की
गई तो फिर उसकी रक्षा का दूसरा उपाय नहीं है। जब तक आपकी यह तरुणाई है तभी तक विशुद्ध
बुद्धिरूपी नाव से इस संसार नामक सागर के परले पार चले जाइए । जो कल्याण है उसे आज ही कर
डालिए। वृद्ध होकर क्या करेगे ? बुढ़ापा आनेपर अपने अंग भी भारभूत हो जाते हैं यानी अपने अंग
भी नहीं संभाले जाते हैं। शेशव (बाल्यवस्था) और वृद्धता को आप क्रमशः पशुता की भाँति ज्ञानकी
असाधक और मृत्युरूप ही समझिए । यदि विवेकसम्पन्न हो तो यौवन ही जीवन है यदि यौवन
अविवेकपूर्ण रहा तो वह पशुता से भी गया गुजरा है। विजली के कौंधने के समान चंचल इस संसार
को पाकर सतशास्त्रों के अभ्यास और सज्जनसंगति द्वारा अज्ञानरूपी कीचड़ से आत्मा का उद्धार
करना चाहिये । ओह ! खेद है, मनुष्यों की निष्ठुरता का कोई ठिकाना नहीं है। जो स्वयं कीचड़ में
गलेतक मग्न होनेपर भी शास्त्रप्रतिपादित उपायों से अपने उद्धार का उपाय नहीं करते उन बेचारों
की कौनसी गति होगी ? जैसे मिट्टी के बने हुए वेतालो की (पिशाचो की) सभा ग्रामीण पुरुष को, जो
ये मिट्टी के वने हैं यह नहीं जानता किन्तु असली वेतालो की सभा मैंने देखी यों भ्रान्ति है अतः भय,
ज्वर आदि दुःखदायक होती है और जिसकी दृष्टि में यह मिट्ठी के वेतालों की सभा हे यों यथार्थज्ञान
से वेतालसभा मिट्टी की ही होती है उसे भय, ज्वर आदि दुःख नहीं होते वैसे ही ब्रह्ममयी यह दृश्यशोभा
अज्ञानी को, जो इसे ब्रह्ममय नहीं देखता है, भय, क्लेश आदि देती है