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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

तदिन्द्रियजये युक्तिमिमामविकलां श्रृणु । सिद्धिमेति स्वयत्नेन सुखेन तनुरेतया ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि नाना (द्वैत) नहीं है तो जो नाना-सा मालूम पड़ता है वह क्या है ? इस पर कहते हैं। चित्‌ का चारों ओर भान अनाना होता हुआ भी नाना-सा मालूम होता है । जो नाना है वह - जैसे स्वप्ननगरों और गन्धर्वनगरों में पदार्थ निस्स्वरूप ही है पर वह स्वसाक्षी आत्मा से अपने को दर्शाता है वैसे ही-निस्स्वरूप है यानी उसका कोई स्वरूप नहीं है वह स्वसाक्षी आत्मा से अपने को दर्शता है