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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 160

एक सौ अद्जावनवाँ सर्ग समाप्त (०70) समाधि में मुनि को दीर्घतर काल के भी अल्प प्रतीत होने से "अल्पेनैव कालेन” कहा है।

29 verse-groups

  1. Verses 1–2यद्यपि यहाँपर यथाश्रुत ग्रन्थ के अनुसार पहले मुनि का शरीरत्याग, उसके अनन्तर चिरकाल के बाद…
  2. Verses 3–5भासने कहा : भगवान्‌ अग्नि यह कहकर मूर्तिरूप से वहीं पर अन्तर्हित हो गये तथा अग्नि के रूप…
  3. Verses 6–12हे महाराज दशरथ, कहींपर परस्पर मिले हुए (एकत्र हुए) छत्रमय अंगवाले प्राणी भासते थे, उनमें…
  4. Verses 13–16हे रघुकुलतिलक, कहींपर पर्वत के से आकारवाले सब प्राणी पार्थिव देहधारी प्रतीत होते थे, उनमे…
  5. Verse 17इन्द्र ने कहा : हे विपश्चित्‌, तुम्हारी यह चिति चिरकाल से मृगयोनि तक ही संसार में आना चाह…
  6. Verse 18तुम्हारा उक्त वृत्तान्त स्वप्न की तरह, सारा का सारा मनोरथो द्वारा निर्मित-सा ओर परलोक में…
  7. Verses 19–20क्या मैं मृग-देह से यह सब स्मरण करूँगा ? इस प्रश्नपर "नही" कहते हैं। जब तुम मृगयोनि से मु…
  8. Verse 21उक्त देवराज इन्द्र के यों कहनेपर उसी क्षण में “यह मैं इस वन में हिरन हूँ” ऐसी मेरी निश्चि…
  9. Verses 22–23तब से लेकर वहीं पर्वतपर मैं मन्दार के वन के भीतरी कोनो में तिनके ओर दूब के अंकुर चरनेवाला…
  10. Verse 24हे रघुवर, तदनन्तर उसने मुझे पकड़कर घर ले जाकर तीन दिन अपने घर रक्खा, फिर वह आपकी क्रीडा क…
  11. Verses 25–26हे निष्पाप, मैने आपसे अपना यह सारा वृत्तान्त कह दिया है, जो संसार में प्रसिद्ध ऐन्द्रजालि…
  12. Verse 27श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : जब विपश्चित्‌ यह कहकर वहाँ पर क्षणभर चुप हुआ तब श्लाघ्यमति श्रीरा…
  13. Verse 28श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : अन्य का संकल्पभूत यह मृग यदि हम लोगों का दृष्टिगोचर हुआ है तो ऐस…
  14. Verses 29–31महामुनि, देवता आदि के वरदान, शाप आदि से अन्य संकल्पित भी पदार्थ संकल्परहित अन्य लोगों के…
  15. Verse 32शवबुद्धि से तुमने मेरा जो यह तिरस्कार किया है इस कारण मेरे शाप से उस पृथिवी को तुम शीघ्र…
  16. Verses 33–34देवमृगश्च त्वं तुल्यकालं विपश्चिता" (जितने समय तक विपश्चित्‌ मृग रहेगा उतने ही समय तक तुम…
  17. Verse 35इस प्रकार जगतूप्रसिद्ध दृष्टि से श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान कर तत्त्वद्ष्टि से उ…
  18. Verses 36–37हे महाभाग, जिसमें सब कुछ है, जिससे सबका आविभव हुआ है, जो सर्वत्मिक है, सर्वव्यापक है उस स…
  19. Verses 38–40सर्वात्मा में संकल्प से उत्पन्न पदार्थ परस्पर मिलता है, यह बात मृगदर्शन आदि मे प्रत्यक्ष…
  20. Verse 41अहा ! मन को मोह में डालनेवाली माया अति विषम हे । जिसके कारण विधिर्यो ओर निषेध दोनों एक जग…
  21. Verses 42–57केवल माया का ही नहीं ब्रह्मसत्ता का भी ऐसा ही माहात्म्य है, ऐसा कहते है। यह ब्रह्मसत्ता भ…
  22. Verses 58–59वैसे ही यहाँ से नीचे के प्रदेश में भूमि, यहाँ से अन्य प्रदेश में वायु, आकाश आदि भूत, यहाँ…
  23. Verses 60–63पूर्णदृष्टि होनेपर तत्त्वज्ञता और अज्ञता का भेद भी नष्ट हो जाता है, ऐसा कहते हैं । पूर्णद…
  24. Verse 64को नहीं देखते हे
  25. Verses 65–66वास्तव में तो आत्मा से अतिरिक्त कोर्ड द्रष्टा ही प्रसिद्ध नहीं है, इस आशय से कहते है । चू…
  26. Verse 67यदि यथास्थित वस्तु अशेष विशेषो से शून्य होकर स्थित हो तो ज्ञान से बाधित होनेवाला जगत्‌ चा…
  27. Verse 68अच्छा, हो जगज्जाल इस तरह का, किन्तु जगत्‌ में बद्ध जीवों की ब्रह्म में कैसे स्थिति है ? इ…
  28. Verse 69सृष्टि के आदि में सृष्टिशोभा कैसे भासित होती है ? इस पर कहते हैं। चिदाकाशमयी सृष्टि भी सृ…
  29. Verse 70मैंने अनन्त वैभववाले अनेक जगतों को देखा, अपने कर्मो के परिपाक से प्राप्त हुए सुख-दुःख फलो…