Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
केशोण्ड्रकभ्रान्तिरिव विचित्रग्रन्थिवेष्टना ।
मिथ्यैव दृश्यमाना खेऽदृश्यमाना न किंचन ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्र ने
कहा : हे विपश्चित्, तुम्हारी यह चिति चिरकाल से मृगयोनि तक ही संसार में आना चाहती है। मैंने
तुम्हारा यह अवश्यम्भावी वृत्तान्त देख लिया है । मृग होकर तुम राजा दशरथ की महापुण्यसभा में
पहुँचोगे। वहाँ मेरे द्वारा कहा गया वह अखण्ड ज्ञान तुम्हारी समझ में आ जायेगा ॥१५.१६॥ संसार से
खिन्न हुए तुम उस पृथिवी तल में हिरन बनो । इस क्रम से सभा को प्राप्त होकर वसिष्ठजी के अनुग्रह से
यह सारा व्यर्थ आत्मवृत्तान्त तुम्हारे स्मृतिपथ में आरूढ होगा