Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verse 68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 68
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अच्छा, हो जगज्जाल इस तरह का, किन्तु जगत् में बद्ध जीवों की ब्रह्म में कैसे स्थिति है ? इस
प्रश्न पर कहते हैं।
जैसे समुद्र और जलबिन्दुओं का क्षण में विश्लेष और क्षण में संश्लेष होता है यानी उनकी
अंशांशिभाव से स्थिति होती है वैसे ही ब्रह्मरूपी महासागर में परस्पर स्फुरित हो रहे चिद्अणुभूत जीवों
की जबतक अज्ञान रहता है, अंशांशिभाव से स्थिति होती है