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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

इदानीमपि हे साधो त्वमप्यन्येऽपि केऽपि वा । तीव्रसंवेगसंकल्पनगराण्येवमेव खे ॥ ३६ ॥ कुर्वन्त्येकरसाभ्यासाद्यदि नाम यदृच्छया । तत्तानीदं वपुस्त्यक्त्वा प्राप्नुवन्त्यचिरेण खे ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महाभाग, जिसमें सब कुछ है, जिससे सबका आविभव हुआ है, जो सर्वत्मिक है, सर्वव्यापक है उस सर्वशक्ति सर्वात्मक ब्रह्म मेँ क्या नहीं हो सकता है ? संकल्प से उत्पन्न पदार्थ आपस मेँ मेल नहीं खाता है यह भी उसमें उपपन्न है ओर संकल्पजनित परस्पर मेल खाता हे, इसकी भी उसमें उपपत्ति है