Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सहस्रचन्द्रबिम्बानि शतसूर्याणि कानिचित् ।
सुवर्णामृतवेषाम्बुमयभूतानि कानिचित् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : अन्य का संकल्पभूत यह मृग यदि हम लोगों का दृष्टिगोचर हुआ
है तो ऐसी स्थिति में असंकल्प पुरुष भी अन्य के संकल्परूप सृष्टि में वस्तुएँ देख सकता हे, यह अर्थ
सिद्ध हुआ। भला यह कैसे हो सकता है ? कृपया कहिये