Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 42–57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verses 42–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 42-57
संस्कृत श्लोक
शुभा संविच्छुभांल्लोकान्संपश्यत्यशुभाऽशुभान् ।
खात्मिका खात्मकानेव चिरं वानुभवत्यपि ॥ ४२ ॥
शुद्धा सिद्धपुराण्येव पश्यत्यनुभवत्यपि ।
चिदशुद्धानि रूपाणि दुःखानि नरकेष्वति ॥ ४३ ॥
घूर्णत्पाषाणयमलगिरिचक्रकपेषणम् ।
तत्रान्धकूपपतनं पुनरुद्धारवर्जितम् ॥ ४४ ॥
दारुणेनातिशीतेन देहं पाषाणतां गतम् ।
भूताङ्गारमयानन्तमरुमार्गास्पदं वपुः ॥ ४५ ॥
पूताङ्गारमयाम्भोदसरदङ्गारवर्षणम् ।
तप्तनाराचनिकरपरुषासारदारुणम् ॥ ४६ ॥
वहत्पाषाणचक्रासिसरिदाकाशसंचरम् ।
वक्षोमुक्ताम्बुदाकारकुठाराघातभेदनम् ॥ ४७ ॥
तप्तायःपरुषाश्लेषच्छमिच्छमितिमज्जनम् ।
वृहत्कटकटाशब्दशस्त्रयन्त्रनिपीडनम् ॥ ४८ ॥
चक्रवज्रगदाप्रासशूलासिशरवर्षणम् ।
शाल्मलीग्रहणं पाशं कुशक्तिशततोदनम् ॥ ४९ ॥
तप्तसैकतसंभारपातपातालमज्जनम् ।
दीपच्छन्नानलभयं बृहद्वायसचर्वणम् ॥ ५० ॥
निर्निर्गमाकृशाङ्गारमहाङ्गारप्रवेशनम् ।
शरशक्तिगदाप्रासभुशुण्डीचक्रवेधनम् ॥ ५१ ॥
क्षुत्क्षोभपरुषप्रेतव्रातान्योन्याङ्गचर्वणम् ।
तालोत्तालातिपरुषशिलातलनिपातनम् ॥ ५२ ॥
रुधिरामेध्यपङ्काङ्कपूयनद्यादिसंकटम् ।
शिलाशस्त्रमयाश्वेभपादपाषाणपेषणम् ॥ ५३ ॥
श्वभ्राभोलूकलिखितं जनौघमुसलाहतम् ।
शिरःकरखुरस्कन्धखण्डोत्कगृध्रमण्डलम् ॥ ५४ ॥
एतस्मात्कुकृतादेतत्फलमित्येव भावनात् ।
पश्यत्येवंदेशदृढादविसंवादिविस्तृतः ॥ ५५ ॥
यन्नाम किंचन कदाचन चेतनं खे भातं न भातमथवा यदपूर्वमेव ।
तत्कल्पनाद्भवति तन्मयमेव तद्धि तस्माच्चिरं च चलतीति यदृच्छयैव ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल माया का ही नहीं ब्रह्मसत्ता का भी ऐसा ही माहात्म्य है, ऐसा कहते है।
यह ब्रह्मसत्ता भी ऐसी ही है यह अपने से अपना विविध रूपों में सर्जन करती है। उस ब्रह्मसत्ता से
अविद्या अनादि और सादि भी अनूभूत होती है। यदि तीनों भुवन केवल ज्ञप्ति के (ज्ञान के) विकासरूप
न होते तो महाप्रलय में नष्ट हुए भवनों का अनायास पुनः सर्जन कैसे होता ? कैसे अग्नि का अस्तित्व
होता, कैसे वायु का अस्तित्व होता और कैसे भूमि की सत्ता होती, इसलिए स्वभाव-स्फुरण के सिवा
जगत् अन्य नहीं है । महाकल्पपर्यन्त ही पृथिवी आदि का अस्तित्व है ऐसा माननेवाले जिन लोगों के
लिए वेदान्त आदि, शास्त्र, विद्वानों के अनुभव ओर लोकप्रसिद्ध दृष्टान्त प्रमाणभूत नहीं हैं उन निन्य-
मतियों के साथ सज्जनों को संभाषण आदि नहीं करना चाहिये । इस चिद्विलासदृष्टि से सब कुछ
क्षणभर में प्रमाण हो जाता है, अन्य दृष्टि से यह सब प्रमाण नहीं होता, किन्तु तुच्छ ही होता है, इसलिए
विद्वान् पुरुष ज्ञानदृष्टिसिद्ध वस्तु को ही सारभूत समझते हैं । जैसे स्पन्दन से वायु की शोभा स्फुरित
होती है वैसे ही शुद्ध ज्ञप्तिरूप ब्रह्मसत्ता 'मैं अविद्या हूँ" ऐसे चिन्तन से जगत्रूप में स्फुरित होती है। न
यहाँ कोई मरता है ओर न कोई उत्पन्न होता हे । मैं मरा हूँ और यह मेरा जन्म है यह केवल चिदात्मक
प्रतिभा ही है । मृत्यु अत्यन्त विनाश है । उसमें यदि दुश्यदर्शन हो तो वह सुषुप्ति सुखोपम निद्रा है फिर
यदि दृश्य की प्राप्ति हो तो वह जीवित ही है । इसलिए यहाँ पर न मरण है और न जीवन ही हे । एक
चिन्मात्र स्फुरण जीवन-मरण दोनों ही हैं अथवा दोनों ही नहीं हे । यदि चिन्मात्र मेँ जीवन-मरण दोनों
चेतित हो तो दोनों ही है यदि चेतित न हो तो दोनों ही नहीं हे । चेतित एक ही है, अतः द्वैत की सत्ता ओर
असत्ता की साक्षी चितिका सदा ही श्रेय है । भला बतलाइए तो चिन्मात्र से पृथक् जीवन ही क्या है ?
अक्षय होने के कारण वह दुःखलेशशून्य है, अतः किसको कहाँ दुःख है ? जिस तत्त्वदुष्टि मेँ वाचक
सहित सब वाच्य (रूप) केवल चिदाकाश मात्र है उस तत्त्वदृष्टि में वह भिन्न है और वह अभिन्न हे,
ऐसी एकता ओर द्विता कैसे ? जैसे जल में आवर्त, तरंग, बुदुबुद् आदि जलरूप हैं, वैसे ही परमात्मा में
शरीर आदि परमात्मसत्तासन्निवेशभूत कारण से अभिन्न आकाशरूप ही है । केवल चिद्भानमात्र शान्त
अनाकार या निर्दोष आकाश ही जगत् हे । जो चिद्भान सुघन, अशान्त, द्रव्य ओर साकार के रूप में
स्थित है यही महान् आश्चर्य है । वह जैसे अतीत में प्रतीतिका विषय नहीं है वैसे ही वर्तमान में भी
अनुभूतिका विषय नहीं हे । वर्तमान अनुभूति में यह शून्यात्मा ही दुश्यरूप पिशाच बन कर प्रतीत होता
है, ऐसा आप समझिए। जैसे यह दुश्यमान आकाश है वैसे ही यह चिदाकाशरूप आकाश है, क्योकि यह
चिदाकाश ही आकाशरूप से प्रतीत आकाश होकर स्थित है