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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 13–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verses 13–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

अविद्यैवमनन्तेयं नानाप्रसवशालिनी । जडा हृद्या रसमयी मोहमाधवमञ्जरी ॥ १३ ॥ अन्तशून्या ग्रन्थिमती श्लक्ष्णा स्वङ्कुरकण्टका । जडा रसमयी दीर्घा लतेव वनवैणवी ॥ १४ ॥ फलाशङ्का मुधैवातिनिष्फला चित्तहारिणी । अकालपुष्पमालेव श्रेयसा नाभिनन्दिता ॥ १५ ॥ न किंचिद्रूपिणी पीना नानाभुवनपूरिणी । भूताकुला निरालोका सुदीर्घेव तमोमयी ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रघुकुलतिलक, कहींपर पर्वत के से आकारवाले सब प्राणी पार्थिव देहधारी प्रतीत होते थे, उनमें चेतना थी ओर वे मन्द मन्द गति से चलते थे । कहींपर काष्ठमय देहवाले जीव शोभा पाते थे, तो कहींपर पाषाणमय शरीरवाले अनेक प्राणी थे । कहींपर जीवनभर प्रस्तर प्रतिमा के समान सब एक ही जगह स्थित रहते थे । उनका परस्पर संभाषण आदि द्वारा केवल वाणीमात्र का व्यवहार होता था, गमन आगमन आदि व्यवहार उनमें नहीं था । इन सबको मैंने स्वचित्ताकाश में देखा । इस प्रकार चिरकाल तक देख रहा स्वप्न की तरह मनोमात्र देह होने के कारण नष्ट हो रहा मैं अविद्या का अन्त न पाकर अविद्या तथा दृश्यवर्ग के विषय में निर्वेद को प्राप्त हो गया । इस प्रकार निर्वेद को प्राप्त हुआ मैं किसी एकान्त स्थान में जाकर मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मतत्त्वालोचनरूप तपस्या करने के लिए तत्पर हुआ। तदनन्तर इन्द्र ने मुझसे कहा : हे विपश्चित्‌, चित्ताकाश में मेरी और तुम्हारी मृगरूप दूसरी योनि उपस्थित है, इसलिए यह आत्मतत्व विचार का अवसर नहीं हे । मैं अल्पपुण्य हूँ, अतएव कदाचित्‌ मुझमें मृगयोनिप्रापक दुष्कृत की संभावना हो सकती है, आप तो महापुण्यशाली हैँ आपकी मृगयोनि में गमन की संभावना केसे हो सकती है ? मेरी इस आशंकापर उन्होने कहा : प्राक्तन अभ्यास से विवश हुआ मैं भी स्वर्गभोगयुक्त संमोह में (दुर्वासाजी के अपराध में) प्रवृत्त हूँ। आकाश में मन्दारवन में घूम रहे मेरी उस मोह में प्रवृत्ति हो गई ।७-१२॥ उनके (देवराज इन्द्र के) यह कहने पर मैंने उनसे निवेदन किया : देवाधिदेव, मैं संसार से ऊब गया हूँ, अतः शीघ्र मुक्त होना चाहता हूँ। मेरा यह कथन सुनकर उन्होंने मुझसे कहा। शीघ्र मुक्ति तो 'मैं तीन अवस्थाओं से और मूर्त-अमूर्त रूपसे रहित विशुद्ध आत्मा ही हूँ इस तत्त्वज्ञान से ही होती है। यह तुमने पहले व्याध मुनि संवाद वर्णन के प्रसंग से अग्निदेव के मुखारविन्द से सुना ही है । इसलिए तुम दूसरा वर माँगो ऐसा इन्द्र के कहनेपर मैंने उनसे अन्य यानी मृगता के बाद मेरा आगे क्या होगा यह परिज्ञानरूप वर माँगा