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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । विपश्चिति वदत्येवं तद्वृत्तान्तमवेक्षितुम् । इव लोकान्तरं भानुः पादैर्दूरायतैर्ययौ ॥ १ ॥ उदभूत्पूरयन्नाशा दिनपर्यन्तदुन्दुभिः । तुष्टाभिरिव निर्मुक्तो दिग्भिर्जयजयारवः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि यहाँपर यथाश्रुत ग्रन्थ के अनुसार पहले मुनि का शरीरत्याग, उसके अनन्तर चिरकाल के बाद व्याध की मनोकामना पूर्ण करने के लिए ब्रह्माजी का आगमन प्रतीत होता है तथापि पूर्व सर्ग में मुनिजी ने जो भविष्यवाणी की थी उसमें व्याध के वर पाने के बाद ““मामापृच्छन्नमस्कृत्य“ यानी मुझे पूछकर नमस्कार कर उसी क्षण में वह “तुम चित्त में वासनारूप से स्थित पदार्थ को देखने की इच्छा से आकाश में उड़ोगे”, ऐसा मुनि ने कहा है, अतएव व्याध के ऊपर जाने के समय मुनिजी का जीवन था ही उसके पीछे ही उनका देहत्याग हुआ ऐसा समझना चाहिये । एक सौ उनसठवाँ सर्ग अग्नि का विपश्चित्‌ से अपना इन्द्रलोक गमन कहना तथा बहुत से आश्चर्यो का वर्णनकर अन्त में ब्रह्मतत्त्व का वर्णन करना । अग्नि ने कहा : हे श्रेष्ठ विपश्चित्‌, तुम स्थिर होने से फिर प्रस्तुत व्यवहार से सम्पन्न भूतल मेँ पर्हैवकर स्वाभिमत दिशा को जाओ । प्रजावर्ग के स्वामी देवराज इन्द्र सौवाँ यज्ञ करने को प्रस्तुत है, उन्होंने उसमें मन्त्र द्वारा मुझे निमन्त्रित किया हे, अतः हे गतिकोविद, में वहाँ जाता हू

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ अद्जावनवाँ सर्ग समाप्त (०70) समाधि में मुनि को दीर्घतर काल के भी अल्प प्रतीत होने से "अल्पेनैव कालेन” कहा है।