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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

संकल्प्यन्ते निरन्तानि किल तानि यथा यथा । चितौ तथा तथा भान्ति केवात्र वद चित्रता ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जगतूप्रसिद्ध दृष्टि से श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान कर तत्त्वद्ष्टि से उसका समाधान करते हैं। वस्तुतः विचार (व्यवहारिक जगत्‌) सत है यह बात भी नहीं है और दूसरा (संकल्पित जगत्‌) असत्य है यह बात भी नहीं है। दोनों तुल्य हैं क्योंकि वह प्रतिभा ही वैसे (व्यावहारिक अथवा संकल्पितरूप से) उदित होती है । इसलिए उनमें क्या सत्‌ हे ओर क्या असत्‌ है २।३४॥ ब्रह्म के सर्वशक्ति और सर्वात्मक होने से भी कोई विरोध नहीं है, यह कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, युक्तियों के इस सिलसिले में स्पष्ट समझ में आने के लिए आप ओर भी दूसरी युक्ति सुनिये