Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 29-31
संस्कृत श्लोक
स्वेच्छातमःप्रकाशानि नित्यानन्दमयानि च ।
कानिचिन्नीयमानानि तनुतूललघूनि च ॥ २९ ॥
क्षणोत्पत्तिविनाशानि कानिचित्कलनावशात् ।
अनन्तस्वन्नपानानि निर्जरामरणानि च ॥ ३० ॥
विचित्रसंनिवेशानि विचित्रविभवानि च ।
सर्वर्तुगुणरम्याणि सर्वकाममयानि च ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि, देवता आदि के वरदान, शाप आदि से अन्य संकल्पित भी पदार्थ संकल्परहित अन्य
लोगों के दर्शन आदि व्यवहार के योग्य होता है यों श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का उत्तर कहने के लिए
पूर्वोक्त शव के पतन का ही अन्य निमित्त से वर्णन करने के लिए विपश्चित् प्रस्ताव करता है।
जिस जगत् में भूतल पर वह महाशव गिरा, शव गिरने से पहले उस भूमि की ओर मन्दारवन
में स्वकृत यज्ञो की यजमानता के घमण्ड से अन्धे की तरह चल रहे इन्द्र ने यह मुनि हैं यह ज्ञान
न होने के कारण यह मुर्दा है यों तिरस्कार से आकाश में ध्यान में बैठे हुए दुर्वासा ऋषिजी को पैर
से ठोकर मार दी, इस कारण ऋषि क्रुद्ध हो गये । उन्होने कहा : अरे इन्द्र, तुम जिस भूमितल में
जाना चाहते हो उसे ब्रह्माण्ड के तुल्य महा भीषण शव शीघ्र ही चूर चूर कर डालेगा