Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 151
एक सौ उनचासवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचायवाँ सर्ग मुनि के वचनों से आत्मज्ञान, मुनि के साथ अपनी स्थिति, पूर्वं देह मेँ गमन की अशक्ति का प्रश्न होने पर देह के दाह आदि का वर्णन ।
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- Verse 1मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, उस समय इस तरह की युक्ति से उन मुनिजी द्वारा यह मैं उस भाँत…
- Verse 2उसके पश्चात् मैंने उनका पल्ला नहीं छोड़ा । चिर प्रार्थना, भक्ति, अनुगमन आदि गुणों से वशी…
- Verses 3–4जिन मुनि महाराज ने चन्द्रोदय के समान सुन्दर यह वचन मुझसे कहा था, देखो वे ये मुनि तुम्हारी…
- Verse 5अग्नि ने कहा : हे विपश्चित्, उस समय मुनि का वह वचन सुनकर बेचारा व्याध स्वप्न में उद्भूत…
- Verse 6यह अत्यन्त आश्चर्य आज मुझसे कहा है, जो कि मेरे मन में नहीं बैठ रहा है
- Verse 7हे मुनिवर, स्वप्न मेँ अपने उपदेशकरूप से जिनका आपने मुझसे वर्णन किया था उनकी आप जाग्रत मेँ…
- Verses 8–9हे मुनिनायक, बालक के वेताल की तरह यह महान् स्वप्नपुरुष जाग्रत अवस्था मेँ भी कैसे स्थिर ह…
- Verses 10–12मुनि महाराज ने कहा : हे महाभाग, तदुपरान्त यहाँ मेरी क्या आश्चर्यमय घटना हुई उसे सुनो । मै…
- Verse 13उसके बाद मुझे अपने पहले के मुनिभाव का स्मरण हो आया, ऐसा कहते है । तदनन्तर अहा यह मैं पहले…
- Verse 14अपनी उस गृहस्थाश्रम अवस्था पर शोक करते हैं। अहो, जैसे थकावट से चूर चूर हुआ प्यासा अज्ञानी…
- Verses 15–16ओह, जैसे केवल भ्रमरूप वेताल से बालक छला जाता है वैसे ही दृश्य की उपलब्धि से, जो कि केवल भ…
- Verse 17अथवा जो "सोऽहम्" (वह मेँ हूँ) इस तरह की प्रत्यभिज्ञा का विषय तत्ता, अहन्ता आदि हे, वह भी…
- Verse 18न तो मेँ हूँ, न यह स्त्री है, यह घर है और न यह भ्रम है - यह सब मिथ्या है फिर भी सत् की त…
- Verse 19इस समय यहाँ मुझे क्या करना चाहिये । मेरे बन्धन को तोड़ डालनेवाला आशभ्यन्तरिक ब्रह्माकारवृ…
- Verse 20जगद्भ्रान्ति तो अविद्या होने से विद्यावृत्ति से ही उच्छिन्न हो ही गई, अतः वह इस समय त्याज…
- Verse 21यहाँ ये उपदेशक मुनि महाराज भी केवल भ्रान्तिरूपही हैं। ये उपदेश देनेवाले मुनिजी मुझ शिष्य…
- Verse 22इसलिए, ज्ञानसम्पन्न महामुनिजी से ऐसा सब मैं कहूँगा यह सोचकर मैंने वहाँ उन मुनिजी से यह कहा
- Verse 23हे मुनिवर, मैं आश्रम में स्थित अपने मुनि-शरीर को और जिस प्राणी के शरीर को देखने के लिए प्…
- Verse 24ऐसा सुनकर उन मुनिनायक ने उस समय हँसते हुए मुझसे कहा : वे दोनों शरीर कहाँ हैं ? वे दोनों द…
- Verse 25हे वृत्तान्तअज्ञ, अथवा जाओ, स्वयं जाकर अपने आप ही उस वृत्तान्त को देखो। जैसी घटना हुई है…
- Verse 26मुनि महाराज के यह कहनेपर अपने पुराने शरीर का खयालकर वहाँ जाने के लिए मैं तैयार हुआ । वहाँ…
- Verse 27हे मुनिमहाराज, जब तक मैं अपने पुराने शरीर को देखकर लौटता तब तक आप कृपया यहीं रहें, यह कहक…
- Verses 28–34इसके बाद वायुरूपी रथपर सवार होकर फूलकी सुगन्ध की तरह मैंने आकाश में चिरकालतक त्वरा से भ्र…
- Verse 35यह सब मैंने मुनि के समीप जाकर उनसे पूछा । महाशय मुनि महाराज ने मुझसे कहा : हे कमलनयन, शरी…
- Verses 36–37तो उसके दर्शन का क्या उपाय है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। यदि तुम योग से एकाग्र बुद्धि से इस…
- Verse 38पहले तुम अपने जीवतत्त्व को समझो, उसके बाद मैं तुम्हारे पूर्वशरीर का वृत्तान्त कहूँगा। ऐसा…
- Verse 39तो मेरा व्यष्टिभाव कैसे हुआ और उसमें (व्यष्टिभाव मे) ये सकल भान्तिर्यो कैसे आई ? इस प्रश्…
- Verses 40–43तुमने जीव के हृदय में प्रविष्ट होकर वहाँ यह विस्तारयुक्त त्रिभुवन देखा था, जिसका पृथिवीलो…
- Verse 44अग्नि से गुफारूपी घर से बाहर निकले हुए सिंहों की दहाड़रूपी डॉँट-फटकारों तथा साफ-साफ सुनाई…
- Verse 45चारों ओर से आग से घिरे होने के कारण अग्निवृक्ष से बने हुए ताल, तमाल आदि वृक्षपंक्तियों के…
- Verses 46–47दूर देशों में स्थित लोगों ने उक्त अग्नि को यह स्थिर बिजली है ऐसा देखा वह आकाश को गलाए हुए…
- Verse 48ज्वालाओं के धाँय धाँय शब्दों से आकाश के मध्यभाग को उसने गुँजा दिया था और गुफारूपी गृह से…
- Verse 49आधे जले हुए सिंह, बाघ और पक्षी उसमें इधर-उधर भाग रहे थे, तालाब और नदियों के खौलते हुए जल…
- Verses 50–51चारों ओर से घेर रही ज्वालाओं से जल रहीं बालचमरियों से वह बडी भली दिखाई देती थी । जल रहे व…
- Verse 52व्याध ने कहा : हे मुनिवर, वहाँपर उक्त अग्निदाह का क्या कारण उपस्थित हुआ ? वह वन और वे आपक…
- Verses 53–55मुनि ने कहा : हे व्याध, जैसे संकल्प के नाश और उदय में संकल्प करनेवाले पुरुष का मनस्पन्द ह…
- Verses 56–57ब्रह्माजी का मानस संकल्प ही इस समष्टि त्रिलोक का कारण हे । वह समष्टि त्रिलोक भी अन्य चिदा…