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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 28–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verses 28–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 28-34

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसके बाद वायुरूपी रथपर सवार होकर फूलकी सुगन्ध की तरह मैंने आकाश में चिरकालतक त्वरा से भ्रमण किया। अन्त को न प्राप्त होकर फिर मैंने चिरकालतक भटककर निरन्तर चलते चलते बाहर निकलने का मार्ग उस प्राणीका गले का छेद या अन्य द्वार नहीं पाया । तब वाताशय में बैठा हुआ मैं खेद को प्राप्त हुआ | तदुपरान्त अपने बन्धनस्तम्भरूप स्वगृह में फिर आये हुए मैंने इन उत्तम अपने गुरु मुनि को अपने आगे पाया । तदुपरान्त सावधान होकर घर में मैने गुरुजी से यह पूछा : हे पूर्वापर जानने वालों में श्रेष्ठ गुरुवर, आप ज्ञानचक्षु से जैसा हुआ हो वैसा ही उत्तम रीति से देखते हैं, इसलिए कृपया कहिये कि यह क्या हुआ ? जिसके शरीर में प्रविष्ट हुआ था, वह प्राणी और मेरा शरीर वे दोनों कहाँ गये ? क्यों मुझे प्राप्त नहीं हुए ? मेने स्थावरपर्यन्त अपने विस्तारपूर्ण संसारमण्डल में चिरकाल तक भ्रमण किया फिर भी बाहर निकलने का मार्ग गले का छिद्र मुझे नहीं मिला ?