Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
अन्यमुनिरुवाच ।
तत्र ते नगरं तानि गृहाणि तरवश्च ते ।
क्षिप्रेण शुष्कतृणवत्सर्वं भस्मत्वमागतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, उस समय इस तरह की युक्ति से उन मुनिजी द्वारा यह मैं उस
भाँति बोधित हुआ जिससे कि ज्ञेय तत्त्व मेरी समझ में आ गया
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ उनचासवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचायवाँ सर्ग मुनि के वचनों से आत्मज्ञान, मुनि के साथ अपनी स्थिति, पूर्वं देह मेँ गमन की अशक्ति का प्रश्न होने पर देह के दाह आदि का वर्णन ।