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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 56–57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verses 56–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 56,57

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी का मानस संकल्प ही इस समष्टि त्रिलोक का कारण हे । वह समष्टि त्रिलोक भी अन्य चिदाकाश में कल्पित है तथा वह भी दूसरे चिदाकाश में कल्पित है, इस प्रकार मायाशबल चिदाकाश की कल्पना की परम्परा का अन्त नहीं हे । निष्कृष्ट दर्शन में तो चिदाकाश में चिदाकाश की शोभा ही विकसित होती है यों विद्वानों की निर्मल दृष्टि है लेकिन मूर्खो की आपात दर्शनरूप यह दृष्टि जैसी भासती है तन्मयी ही है परमार्थ में वह सत्‌ नहीं हे यानी अलीक (मिथ्या) ही हे