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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 38

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

पहले तुम अपने जीवतत्त्व को समझो, उसके बाद मैं तुम्हारे पूर्वशरीर का वृत्तान्त कहूँगा। ऐसा सोच रहे मुनिजी व्यष्टिजीवभाव मिथ्या है समष्टिजीवभाव ही सत्य है यह त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्‌“ इस श्रुति से प्रदर्शित न्याय का अवलम्बन कर कहते हैं । तुम जैसा कि अपने को समझते हो वैसे व्यष्टिजीवरूप नहीं हो, किन्तु सकल प्राणियों के तपरूपी कमलों को विकसित करने में सूर्यरूप, सकल कल्याणो के (मानुष आनन्द से लेकर प्रजापत्य आनन्दपर्यन्त सुखों के) कमलाकर के समान समष्टिरूप हरि भगवान्‌ के नाभिकमल की कर्णिका यानी कर्णिका में आरूढ सर्वजीव समष्टिरूप हिरण्यगर्भ ही हो