Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 10–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verses 10–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 10-12
संस्कृत श्लोक
अस्माकं त्वं स्वप्ननरस्तव स्वप्ननरा वयम् ।
अयमेव चिदाकाशः सर्वदात्मात्मनि स्थितः ॥ १० ॥
ततः प्रभृति संपन्नो भवान्स्वप्ननरो भवन् ।
जाग्रत्प्रत्ययवाञ्जाग्रन्नरो गार्हस्थ्यसुस्थितः ॥ ११ ॥
एतत्ते कथितं सर्वं यथावृत्तमशेषतः ।
अनुभूतं सुदृश्यं च ध्यानेनैतच्च पश्यसि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनि महाराज ने कहा : हे महाभाग, तदुपरान्त यहाँ मेरी क्या आश्चर्यमय घटना हुई उसे सुनो । मैं
संक्षेप में उसका वर्णन करता हूँ । तुम सहसरा जल्दबाजी न करो । तुम्हारे समीप बैठे हुए इन मुनि
महाराज ने वहाँपर उस समय मुझको प्रबुद्ध बनाने के लिए यह वाणी की । इन महात्मा की उस सुन्दर
वाणी से मैं तुरन्त प्रबुद्ध हो गया । तदुपरान्त इनकी उक्त वाणी से मुझे अपने अनादिसिद्ध सन्मात्ररूप
निर्मल स्वभाव का वैसे ही स्मरण हो गया है जैसे कि हेमन्तऋतु के बीतनेपर आकाश को अपने निर्मल
स्वभाव का स्मरण होता है