Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
स शशाम शनैर्वह्निर्निःशेषीकृतकाननः ।
परिपीतार्णवोऽगस्त्य इवास्तं समुपाययौ ॥ ३ ॥
तस्मिन्नस्तं गतेवह्नौ तद्भस्मेद्धं सुशीतलम् ।
दुधाव कणशो वायुरशेषं पुष्पराशिवत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिन मुनि महाराज ने चन्द्रोदय के समान सुन्दर यह वचन मुझसे कहा था, देखो वे ये मुनि तुम्हारी बगल
में ही बैठे हैँ । मेरे अज्ञान को छिन्न-भिन्न करनेवाले तथा दृश्य के पूर्वापर का ज्ञान रखने वाले इन्हीं
मुनि महाराज ने, जो मूर्तिधारी मेरे यज्ञादि पुण्य के समान हैं, प्रार्थना के बिना यह उत्तम वचन मुझसे
कहा