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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

लब्धवानसि नो तस्माद्धेतोर्देहद्वयं मुने । अनन्ते स्वप्नसंसारजाग्रतीहावतिष्ठसे ॥ ८ ॥ तदेवं स्वप्न एवायं जाग्रद्भावमुपागतः । सर्वे वयमिह स्वप्नपुरुषास्तव सुव्रत ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिनायक, बालक के वेताल की तरह यह महान्‌ स्वप्नपुरुष जाग्रत अवस्था मेँ भी कैसे स्थिर हो गया ? इस तरह का आश्चर्यमय यह सारा आख्यान कृपया आद्योपान्त मुझसे कहिये । इस समय स्वप्नपुरुष का यह दर्शन किस निमित्त से हुआ, यह दर्शन किसका है अथवा यह स्वप्न है या जाग्रत है ?