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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 146

एक सौ चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पैंतालीसवाँ सर्ग कफ, पित्त ओर वायु से भरे हुए जीव के ओज मेँ (तेजोधातु में ) कल्पित स्वप्नभेदों का तथा इन्द्रियों से बाहरी भ्रमों का वर्णन ।

17 verse-groups

  1. Verse 1मुनिजी ने कहा : हे व्याध, यह जीव बाहरी इन्द्रियों से बाहर ही स्वप्न को जानता है तथा भीतरी…
  2. Verses 2–4जब वह बाहरी इन्द्रियों से बाहरी व्यवहार करता है तव क्या आभ्यन्तर व्यवहार बिल्कुल ही नहीं…
  3. Verse 5इसलिए बाहर अथवा भीतर जहाँ कहीं भी इन्द्रियो का प्रसार होता है वहाँ पर स्थूल जगत्‌ दृष्टि…
  4. Verse 6कान, त्वचा, नेत्र, नाक, जीभ, इच्छाप्रधान अन्तःकरण चतुष्टय का संघातरूप ओर पंच प्राणों से य…
  5. Verse 7तथोक्त जीव स्ववासनामय जगत्‌ को भले ही देखे, लेकिन बाहर तो वासना न होने से वह वासनामय जगत्…
  6. Verses 8–18अन्दर स्वप्नभेद-वैचित्रय देखने के लिए ओज में प्रविष्ट हुए जीव का श्षेष्मआदि अन्नरस आदि से…
  7. Verses 19–22लीलाविलासपूर्ण ठंग से लपेटी हुई चोटियों से मुक्त अतएव जिनकी शाखाएँ फैली हों ऐसी मालती लता…
  8. Verse 23कफपूर्ण नाड़ी के दृश्यों का विस्तार से वर्णन कर अब पित्तरसपूर्ण नाडी के दृश्यों का वर्णन…
  9. Verses 24–33तथा शिलाजीत आदि क्षार को चूआनेवाले ओर झाड़ियों से दुर्गम अरण्यों को भी देखता है । बह रहे…
  10. Verses 34–39कफ, पित्त आदि अन्नरसों से रिक्त केवल वायु से ही भरे हुए नाड़ीप्रदेशों में प्रविष्ट हुआ अण…
  11. Verses 40–45कफ, पित्त और वायु में एक एक द्वारा पूर्ण नाडी में दिखाई देनेवाले विविध स्वप्नो को दिखलाकर…
  12. Verses 46–49मैंने जो प्रलयसमुद्र को दिखानेवाला स्वप्न देखा था, उसमें भी यही कारण था ऐसा सूचित करते हु…
  13. Verses 50–54कफ, वात और पित्तरूप त्रिधातु से पूर्ण नाड़ियों में पूर्वोक्त प्रकार के सर्वजन विदित उन पत…
  14. Verses 55–70सुषुप्ति से स्वप्न में कैसे प्राप्त होता है, इस प्रश्नपर कहते हैं। जब खाया हुआ अन्न परिपा…
  15. Verse 71विषम वात, पित्त धातुवाले पुरुष इस प्रकार के अनेक दृश्यों को स्वप्न की तरह बाहर ही देखते ह…
  16. Verse 72विषम धातुवाले जीवों को बाहर और भीतर अति भीषण अनेक विपरीत कार्य दिखाई देते हैं
  17. Verses 73–77वात, पित्त आदि धातुओं के सम होनेपर यह जीव तेजोधातु के मध्य में स्थित होकर ही इस सम लौकिक…