Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 8–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 8–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 8-18
संस्कृत श्लोक
यथा दृष्टिश्चिराद्ध्वान्ते भाति चक्रकरूपिणी ।
सुषुप्तमेव तत्रासीत्तथा स्वप्नत्वमागतम् ॥ ८ ॥
तथा सुषुप्तविश्रान्तेः स्वप्ने निद्रामहं विशम् ।
अपश्यं दृश्यमोजोऽन्तः स्वमूर्मित्वमिवार्णवः ॥ ९ ॥
संवित्कोशात्मकं दृश्यं तत्तथा मामुपागतम् ।
अस्पन्दस्यानिलस्यान्तरनन्यत्स्पन्दनं यथा ॥ १० ॥
अग्न्यादौ च यथोष्णत्वं जलादौ द्रवता यथा ।
मरीचादौ यथा तैक्ष्ण्यं चिद्व्योम्नश्च जगत्तथा ॥ ११ ॥
चित्स्वभावैकरूपत्वाज्जगद्दृश्यं तदाततम् ।
तत्सुषुप्तात्मनो दृश्यात्प्रसूतं बालपुत्रवत् ॥ १२ ॥
व्याध उवाच ।
तत्सुषुप्तात्मनो दृश्यादिति तद्व्यपदेशतः ।
सुषुप्तदृश्यं किं वक्षि वद मे वदतां वर ॥ १३ ॥
तत्सुषुप्तात्मनो दृश्यात्त्वत्सुषुप्तात्मनोऽपि च ।
किमन्यज्जायते जन्यमथवान्यसुषुप्तता ॥ १४ ॥
मुनिरुवाच ।
जायते भाति कचति घटादि जगदादि च ।
इति द्वैतोपतप्तानां प्रलापः कल्पनात्मकः ॥ १५ ॥
जातशब्दो हि सन्मात्रपर्यायः श्रूयतां कथम् ।
प्रादुर्भावे जनिस्तूक्तः प्रादुर्भावस्य भूर्वपुः ॥ १६ ॥
सत्तार्थ एव भूः प्रोक्तस्तस्मात्संजातमुच्यते ।
सर्गतो जात इत्युक्ते सन्सर्ग इति शब्दितम् ॥ १७ ॥
बुधानामस्मदादीनां न किंचिन्नाम जायते ।
न च नश्यति वा किंचित्सर्वं शान्तमजं च सत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्दर स्वप्नभेद-वैचित्रय देखने के लिए ओज में प्रविष्ट हुए जीव का श्षेष्मआदि अन्नरस आदि से
पूर्ण नाडयो मे प्रवेश ही उसमें निमित्त है, यह विस्तार से बतलाते हैँ ।
जिस समय तुम्हारा जीव अपने सम्पूर्णं कारणों का उपसंहार कर अणुरूप बनकर हजारों हिस्सों में
विभक्त केश के समान महीन नाडियों के अन्दर संचार के योग्य हो नाडियों के अन्तर्गत कफरूप
अन्नरस से भर जाता है, उस समय तत्-तत् इन्द्रियाणु में नाडी के अन्दर ही निम्न निर्दिष्ट स्वप्न भ्रमों
को देखता हे । उक्त जीव स्वयं क्षीरसागर में उड़ा हुआ-सा बनकर चन्द्रोदय से जगमगा रहे आकाश
को देखता हे, लाल कमलो से वेष्टित तालाबों को देखता है, जिनमें भाँति-भाँति के कमल खिले हैँ
और आकाश मेँ प्रकट हुए उद्यानं को देखता है, जो ऋतुराज वसन्त के अन्तःपुर जैसे मनोहर हैं,
पुष्पमय दिव्य मेघो के प्रतिनिधिस्वरूप हैं तथा जिनमें भ्रमर कलगुंजन करते हैं । सन्मंगलों की परम्परा
से पूर्ण बड़े बड़े उत्सवों को देखता है जिनमें ललनाओं के झुण्ड के झुण्ड लीला विलासो से चंचल हैं
और घरों के आँगन भक्ष्य, भोज्य अन्न-पान से खूब भरे हैं । फूलों की मालाओं से अलंकृत, फेनरूपी
हासवाली, मस्तयौवनवाली तथा चंचल नयन हैं ऐसी नदिर्यो विलास से अपने स्वामी सागर के समीप
जाती हैं, ऐसा देखता है हिमालय के ऐसे सफेद शिखरवाले, अत्यन्त ठंडक से भरे हुए, चूने से खूब
सफेद दीवारवाले ओर चन्द्रमा से बने हुए जैसे निर्मल फर्शवाले महलों को देखता है । शीतल जलकणों
से ढके हुए, हेमन्त ऋतु की बरफ से आच्छादित तथा वर्षाऋतु के बादलों से आवृत्त एवं नीलकमलों की
लताओं तथा हरी-हरी घास से ठके मैदानों को देखता है चिकने-चिकने पत्तोवाले वृक्षों की मनोहर
छायावाली तथा फूलों के अम्बार से आच्छन्न नगरों की उपवनभूमियों को, देखता है, जिनमें हरिण
ओर पथिक विश्राम करते हैं । कदम्ब, कुन्द, ओर मन्दार के शहद के विन्दुरूपी चन्द्रमा की कान्तियों से
भासमान फूलों के बगीचे देखता है, जिनकी बनावट-सजावट आसन के सदुश जगमग जगमग करती
हे । मेघनिर्मुक्त निर्मल आकाश के सदृश मनोहर नीली वनश्रेणियों को देखता है, जिनमें चारों ओर
कमलो के तालाबों का जाल-सा विष्ठा रहता है ओर जो सुन्दर फूलों से भरे हुए भूखण्ड को धारण
करती हे । वायुवश नाच रहे सुन्दर लीलापल्लवों से रमणीय पर्वतमालाओं को देखता हे, जिन्होंने केले
के गोफ, कुन्द ओर कदम्ब का मुकुट धारण किया हे