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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 46–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 46–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 46-49

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मैंने जो प्रलयसमुद्र को दिखानेवाला स्वप्न देखा था, उसमें भी यही कारण था ऐसा सूचित करते हुए कहते हैं। शिलाखण्डों से भरी हुई जलराशि से आकाश को पूर्ण करनेवाले महासागर को देखता है, जो बह रहे वनों ओर मेघों के आघातों से (धक्कों से) सप्तर्षिलोक मे टक्कर मारता है। परस्पर लहरों द्वारा सींचने से धोई हुई दसों दिशाओं के दृष्टिगोचर होने से मानों जो हँसता-सा है, दिशाओं को आच्छादित कर रहे कटकट शब्द के साथ फूट फूटकर धराशायी हो रहे पर्वतशिखरों से मानों जिसपर घन के प्रहार की ध्वनि होती है, जिसपर वायु द्वारा कँपाई गई वायु का अनुसरण करनेवाली लताओं का ताण्डव होता है, शब्दायमान अपने से हुए पत्थर के चूर्णो से धूमेले या मटमेले कमल, सेवाल आदि को जो धारण करता है, समुद्र का आक्रमण होने से पहले युगान्त में हुए शूरवीरों की परस्पर की मारकाटों से मानों अद्भूत हुए ताड़ आदि के वनों की मरमर ध्वनियों से, जो क्रूर प्राणियों के रोदन ध्वनि के तुल्य लगती है, विराजित ऐसा त्रिजगत्‌ उसे मालूम पडता हे