Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 40–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 40–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 40-45
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
कफ, पित्त और वायु में एक एक द्वारा पूर्ण नाडी में दिखाई देनेवाले विविध स्वप्नो को दिखलाकर
कफ, वात, पित्त-इन तीनों से पूर्ण नाडी से दिखाई देनेवाले स्वप्नो को दिखलाते हैं।
वात, पित्त, कफ से पूर्ण नाडीप्रदेशों में प्रविष्ट हुआ अणुमात्ररूप जीव जब वात, पित्त और कफ से
पूर्ण होता है तब वायु के वशीभूत हुए भागों से पीड़ित होकर निम्नलिखित स्वप्नों को देखता है। ऊपर
से गिर रही पर्वतों की वृष्टि देखता है, बड़ी-बड़ी शिलाओं की वृष्टि से संकटाकीर्ण फट रहे महलों,
पर्वत के मध्यभागों के (टीलों के) घनघोर शब्द से घूम रही वृक्षराशि को देखता हे । इधर उधर भ्रमण
कर रही वनश्रेणियों से मिश्रित मेघों से भीषण और सिंह, हाथी और वर्षा ऋतु के बादलों से निरन्तर
(निरवकाश) दिगन्तराल को देखता है, जो ताड तमाल, हिन्ताल के पेड़ों की पंक्तियों में आग से
व्याप्त, गुफाओं के घुन्घुम ध्वनि के साँय साँय से खूब घरघराहट युक्त है। मन्दररूपी मथनी के गम्भीर
शब्द के संसर्ग से मनोहर, तोड़ने फोड़ने के लिए अनिवार्य परस्पर की टक्कर से टकराई हुई गुफा को
देखता है पर्वत के दो शिखरों के बीच में प्रवाह-ध्वनियों से दो शिखरों की टक्कर के सदृश, चकवा-
चकवी के करुण क्रेंकरों से कठोर तथा मोतीमालाओं के तुल्य अगल-बगल से गिरने से आकाश को
माला सहित सा बनानेवाली नदियों को देखता है