Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
द्रष्टास्याः स्वप्नदृष्टेस्तु जीवः संभवतीह हि ।
चिदचेत्या तु सर्गादौ भात्यच्छा गगनादपि ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
कफपूर्ण नाड़ी के दृश्यों का विस्तार से वर्णन कर अब पित्तरसपूर्ण नाडी के दृश्यों का वर्णन
करते हैं ।
जब जीव अन्दर पित्तरस से भर जाता है तब अणुरूप जीव ओज के अन्दर इन सब निम्न निर्दिष्ट
पदार्थो को प्राप्त करता है