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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 19–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 19–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 19-22

संस्कृत श्लोक

सर्वसत्तात्मकं ब्रह्म सर्वसत्तात्मकं जगत् । विधयः प्रतिषेधाश्च वद तत्र लगन्ति के ॥ १९ ॥ या नाम शक्तिः काचित्सा तत्रैवास्ति च नास्ति च यस्मात्तदात्म तद्ब्रह्म तथैवात्म तदात्मकम् ॥ २० ॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तादिपरमार्थविदां विदाम् । न विद्यते किंचिदपि यथास्थितमवस्थितम् ॥ २१ ॥ स्वप्नसंकल्पपुरयोर्नास्त्यप्यनुभवस्थयोः । मनागपि यथा रूपं सर्गादौ जगतस्तथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

लीलाविलासपूर्ण ठंग से लपेटी हुई चोटियों से मुक्त अतएव जिनकी शाखाएँ फैली हों ऐसी मालती लता की नाई नाच रही तन्वंगी बालांगनाओं को पाता हे । फूले हुए सफेद कमलं के तालाब के तुल्य राजसभा को प्राप्त करताहै, जो सैकड़ों सुन्दर सुन्दर चवर, फूलदान, चँदवा आदि से पूर्ण हे । लताओं के फैलाने के विलास से चारों ओर घिरी हुई वनपंक्तियों को प्राप्त करता है, जो चंचल जलराशि की नहरों में पक्षियों के कलरव से मधुर मालूम होती हें । जलकण ओर वर्फरूपी हार को अपने उदर में धारण करनेवाली दसों दिशाओं को प्राप्त करता है, जिनके सब पर्वत वृष्टि द्वारा पृथिवी को भरने के लिए अति विकरालरूपवाले मेघो से व्याप्त हैं