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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

मुनिरुवाच । अनन्तरं तदा तत्र श्रृणु किंवृत्तमङ्ग मे । तेजोधातुनिषण्णस्य तज्जीवावलिताकृतेः ॥ २ ॥ तस्मिंस्तदा वर्तमाने घोरे कल्पान्तसंभ्रमे । तृणवत्प्रौढशैलेन्द्रे वहति प्रलयानिले ॥ ३ ॥ गिरिवृष्टिर्झटित्येव कुतोऽपि समुपाययौ । उह्यमानवनाभोगशिखरग्रामपत्तना ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जब वह बाहरी इन्द्रियों से बाहरी व्यवहार करता है तव क्या आभ्यन्तर व्यवहार बिल्कुल ही नहीं होता, इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते है । जिस समय इन्द्र्यो बाह्य व्यवहार में व्यग्र रहती हैं, उस समय मनोरथतुल्य आभ्यन्तर व्यवहार का अनुभव अवश्य होता है, किन्तु धुंधला होता है, स्वप्न के समान उसका साफ साफ अनुभव नहीं होता हे । किन्तु जिस समय सब इन्द्र्यो केवल अन्तर्मुख रहती हैं उस समय जीव अपने शरीर में वासनामात्र होने से सूक्ष्मरूप से विद्यमान स्वप्न-जगत्‌को अति स्थूल-सा देखता है, वही उसका स्फुटअनुभव हे । बाह्य अथवा आन्तर कोई भी जगत्‌ वास्तव में कदापि स्थूल नहीं । जीव के दर्शन में कारणभूत इन्द्रियो की स्थूलता की कल्पना में अप्रतिरुद्ध जो दृष्टि है, वही स्थूल जगत्‌ है