Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 24–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 24–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 24-33
संस्कृत श्लोक
नेह द्रष्टास्ति नो भोक्ता सर्वमस्तीह तादृशम् ।
यन्न किंचिच्च किंचिच्च मौनमेवातिवागपि ॥ २४ ॥
सर्गादौ कारणाभावाद्यद्यथा कचितं चितौ ।
तत्तथास्ते चिरं रूपं स्वप्नसंकल्पपूर्यथा ॥ २५ ॥
तथास्माच्चेतनाद्द्वैताद्बिभेति न बिभेति वा ।
अङ्गसंस्थाद्यथा चित्रात्स्वरूपात्पुरुषः स्वयम् ॥ २६ ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तमेकमत्यच्छमेवातिविकारि नाना ।
यथास्थितं भास्वरमप्यशान्तमिदं समस्तं परिशान्तमेव ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
तथा शिलाजीत आदि क्षार को चूआनेवाले ओर झाड़ियों से दुर्गम अरण्यों को भी देखता है । बह रहे
मृगतृष्णा जलों में तैर रहे सारसो से शोभायमान जल को देखता है, पहले कभी दृष्टिगोचर न हुए
मेदानों को देखता है, जिनमें पेड-पोधे पहले से जमे थे । भयवश मार्गो मे भाग रहे तथा गरम धूलि से
धूसर हुए अपने को देखता हे, दूर से अमृत के तुल्य दिखाई दिये ण्डी छायावाले मार्ग के वृक्ष को
देखता है । संताप से अतिग्रस्त आकारवाले तथा अग्नि के तुल्य परितप्त भुवनको देखता है । धूलिकणों
से जिनके देश छिप गये ऐसी दिशाओं को ओर धूलितिरोहित आकाश को देखता हे । घर, गाँव, सागर,
पहाड़, नदी-तालाब,वन और आकाश में जहाँ दृष्टि पहुँचती हैं वहीं जल रही अग्नि से पूर्ण दिशाएँ
देखता है, अग्नि की वर्षा करनेवाले असंख्य मेघों की घनघोर घटाओं से भीषण शरद्, ग्रीष्म और
वसन्त ऋतुओं को देखता है, सन्ताप देनेवाले सूर्यातपों को देखता है एवं तिनकों, पत्तों, लताराशियों
और लू की लपटों से आच्छादित भूमिप्रदेशों को देखता है । अग्निव्याप्त होने के कारण आकाश,
भूतल और दिङ्मुखों को सुवर्णमय जैसे देखता है । बहुत से तालाबों और हिमालयपर्वत के विविध
प्रदेशों को संतप्त हुए देखता है