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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 34–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 34–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 34-39

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

कफ, पित्त आदि अन्नरसों से रिक्त केवल वायु से ही भरे हुए नाड़ीप्रदेशों में प्रविष्ट हुआ अणुमात्ररूप जीव जब वायु से पूर्ण होता है तब नाड़ी में पूर्वोक्त ओज के अन्दर ही निम्ननिर्दिष्ट स्वप्न देखता है । उक्त जीवकी संवित्‌ वायु से क्षुब्ध हो जाती है, अतएव वह पृथ्वीतल को पूर्वदृष्ट से हुआ विलक्षण देखता है । नगर, गाँव, नदी-नाले, सागर और वनों को अपूर्वं (पूर्वदृष्ट से विलक्षण) देखता है। अपने को उड़ता हुआ सा देखता है, शिलाओं तथा पर्वत के टीलों को उड़ते हुए-से देखता है, देशों को मेघों के गर्जन-तर्जन से शब्दयुक्त देखता है और कुम्हार के चक्के के बिना ही घड़ों का घूमना आदि देखता है । घोड़ा, ऊँट, गरुड, बादल, हंस आदि सवारियों पर चढ़ना देखता है और यक्ष, विद्याधर आदि का दूर से आना और जाना या अपने स्थान में संचार देखता हे । सागर के बुलबुलों की तरह पहाड़, अन्तरिक्ष, भूमि, समुद्रो के साथ वृक्षों, ग्रामों, नगरों, दिशाओं तथा भयभीत मनुष्यों की कँपकँपी देखता है। अपने को अंधे कुएँ में गिरा हुआ या महान्‌ संकट में पड़ा हुआ अथवा गगनचुम्बी पेड़ और पर्वतपर चढ़ा हुआ देखता है