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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 73–77

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 73–77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 73-77

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

वात, पित्त आदि धातुओं के सम होनेपर यह जीव तेजोधातु के मध्य में स्थित होकर ही इस सम लौकिक और शास्त्रीय व्यवहार मर्यादा का स्वयं अनुभव करता है तथा यथास्थित नगर, गाँव, कसबे ओर जंगल की श्रेणी का अनुभव करता है । निश्चल जल और वृक्षछायावाले प्रदेशों में बटोही के रूप से गमनागमन, आनन्ददायक प्रकाशवाले चन्द्रमा, सूर्य, तारा, रात्रि और दिन से विभूषित इस प्रकार का असद्रूप यह जगत्‌ सद्रूप-सा प्रतीत होता है। जैसे पवन में स्पन्दन है वैसे ही चित्‌ तत्त्व में जो यह दृश्योपलम्भ है वह असत्‌ होता हुआ भी सत्‌ सा प्रतीत होता है, अभिन्न होता हुआ भी भिन्नवत्‌ स्थित है। निष्प्रपंच ब्रह्म से शून्यभूत सम्पूर्णं जगत्‌ उदित है, अतएव निष्पप्रपंच ब्रह्मरूप वह उससे तनिक भी अतिरिक्त नहीं है, क्योकि ब्रह्म इस प्रकार परिदृश्यमान रूप से उत्पन्न नहीं होता । इसलिए आकाशसदृश अनन्त चिति के शरीर में प्रतिभासमात्र जगत्‌ इस तरह अनन्त रूपों में प्रतीत होता है, वास्तव में उसका पृथक्‌ अस्तित्व नहीं हे