Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अथ कंचित्तदा कालमनुभूय सुषुप्तताम् ।
तदा पद्माकर इव शनैर्बोधोन्मुखोऽभवम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तथोक्त जीव स्ववासनामय जगत् को भले ही देखे, लेकिन बाहर तो वासना न होने से वह वासनामय
जगत् कैसे देखता है 2 इस प्रश्नपर कहते हैं।
बाहर कूटस्थ चित् ही चिदाभास समष्टि व्योममय होकर सब जगह सब काल में सर्वेन्द्रियमय
स्थित हे । इस कारण वह सर्वत्र सब कुछ देखता है अर्थात् सब वासनाओं के आधाररूप उसमें बाह्य
जगत् का अध्यास किसी हालत में अनुपपन्न नहीं है, उपपन्न ही है