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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 50–54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, verses 50–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 50-54

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

कफ, वात और पित्तरूप त्रिधातु से पूर्ण नाड़ियों में पूर्वोक्त प्रकार के सर्वजन विदित उन पत्थरों, मिट्ठी-धूलि से युक्त वायुओं से अथवा सैनिकों से घिरकर स्वप्न में जड़ बनाया गया जीव जब परिपीड़ित ही रहता है तब वह पुरीतत्‌ नाड़ीरूप पिंजड़े में प्रविष्ट होता है, जो सब पसली की हड्डियों के सिरों से बनी हृदय की हड्डी ग्रन्थि से युक्त है। आगे चलने फिरने के लिए छिद्रका संभव न होने से प्राणवायु प्रयुक्त स्पन्द से रहित होकर ऊँची ऊँची पसली की हड्डियों से बिल में पत्थरों की राशि से निरुद्ध की तरह, कोई भी व्यापार करने में असमर्थ हो मिट्टी के अन्दर दबे हुए कीड़े की तरह, चट्टान के भीतर छिपे मेढक की तरह, बीज के अन्दर स्थित अंकुर की तरह, पिण्डीभूत द्रव्य के अन्दर के परमाणु की तरह तथा खंभे के अन्दर प्रतिमा के देह के तुल्य निबिड़ तेजोधातु नामक ओज के अन्दर ही शिला के आकाश की तरह गाढ अज्ञान होने से अन्धकूप के उदर के तुल्य सुषुप्ति का स्वयम्‌ अनुभव करता है