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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 145

32 verse-groups

  1. Verses 1–4विवर्तं के समान अन्य रूपता को प्राप्त होता है । जिसी समय भूमि, जल, आकाश, शेल आदि यह जगत्‌…
  2. Verse 5यह सम्पूर्णं जगत्‌ असत्‌ होता हुआ भी स्वप्न के समान अनुभव में आता है । यदि जगत्‌ नहीं है…
  3. Verses 6–7हम लोगों का प्रसिद्ध यह जगत्‌ जैसा है वैसे ही आकाश में हजारों लाखों जगत्‌ अन्य मनुष्यों क…
  4. Verses 8–9जैसे एक नगर में सैकड़ों स्वप्ननगरों का भान होता है और नहीं भी होता वैसे ही आकाश में जगतां…
  5. Verse 10चित्‌ का चमत्काररूप दृश्य स्वात्मा के निज अंगों की तरह अभिन्न हे । (अद्वितीय है) एक की दृ…
  6. Verse 11जीवों के ये जगत्‌संस्कार क्या देह में हैं या चित्‌ में हैं यदि चित्‌ में हैं तो वे सबके ल…
  7. Verse 12यदि जगत्‌ के संस्कारों को धारण करनेवाली बुद्धि का ही परिणाम जगत्‌ है तो संकल्प-पदार्थ अनु…
  8. Verse 13यह जाग्रतसृष्टिरूप जगत्‌ भी सृष्टि के आरंभ में चिदाकाशरूप स्वच्छ स्वप्नप्रतिभा के समान वि…
  9. Verse 14(सर्वथा भावाभावेषु“ इत्यादि विविध प्रकार से कही गई उक्तियो' के सिद्धान्तभूत निष्कर्ष को इ…
  10. Verse 15वह परमात्मा ही कारण और कार्य भी कहा गया है, क्योकि वही पूर्ववर्ती सामान्यरूप कारण है ओर व…
  11. Verses 16–17स्वप्न आदि में जाग्रतूपदार्थो से विलक्षण और जाग्रत्‌पदार्थो का दृष्टान्तभूत जो पदार्थ प्र…
  12. Verse 18वही शम, दम आदि साधनसम्पत्ति सम्पन्न श्रवण, मनन आदि द्वारा निश्चित अद्वितीय प्रत्यगृब्रह्म…
  13. Verse 19अव अन्य द्वारा निर्धारित स्वप्नदर्शन के प्रकार का अनुवाद कर खण्डन करते हैँ । स्वप्न में ज…
  14. Verse 20उनका उक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि जैसे वायु में चारों ओर स्पन्द स्वतः स्थित है वैसे ही च…
  15. Verse 21चित्त में सब पदार्थ स्थित हैं, यह कैसे ज्ञात होता है 2 इस प्रश्नपर कहते है । देखिये न, स्…
  16. Verse 22चिदाकाश में जो स्वप्न प्रतीति है वही जगत्‌ कहलाता है, चिदाकाश में जो सुषुप्ति है वही प्रल…
  17. Verse 23एक ही चिदाकाश अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप का त्याग किये बिना ही जो स्वप्न की तरह साका…
  18. Verses 24–25इस उपपत्ति से जैसे स्वप्न अथवा जैसे दर्पण में देखे गये मुख, वन, पर्वतादि अनन्य है वैसे ही…
  19. Verse 26इसलिए जहाँपर असीम अविनाशी चिदाकाश निरन्तर स्थित है वहाँपर वह जगत्‌भान स्थित है, जो कि उसक…
  20. Verse 27चिन्मात्र मं ही भुवन स्थित है, 'त्वम्‌” (तुम) "अहम्‌" (मैं) इत्यादि जगत्‌ चिन्मय ही है, इ…
  21. Verse 28गुरु और शास्त्र द्वारा उक्त युक्तयो से कैसा ज्ञान होता है, यह पूछनेपर उसको अपने अनुभव कथन…
  22. Verse 29चिदाकाशरूप मैं चिन्मात्र परमाणु होकर भी जगद्रूप से स्थितरहू ओर जहाँ चिदाकाशरूप मैं रहता ह…
  23. Verse 30चित्परमाणुरूप (शोधित त्वं पदार्थरूप) मैं चित्परमाणु के (शोधित तत्पदार्थ ब्रह्म के) साथ उस…
  24. Verses 31–35इस प्रश्नोत्तर के सिलसिले में आत्मज्ञान का तत्त्त बतलाकर प्रस्तुत कथा का अवलम्बन करके पुन…
  25. Verse 36अन्त में ब्रह्मअद्वैत की सिद्धि द्वारा अकारण पक्ष का ही समर्थन कर रहे मुनि उत्तर देते हैं…
  26. Verse 37इस सृष्टि मेँ निष्कारण पदार्थो का अत्यन्त असंभव होने से अकारण किसी स्थूल सर्ग की कहींपर भ…
  27. Verse 38चित्स्वभाव होने से जन्मविनाशशून्य यह ब्रह्म ही इस प्रकार देदीप्यमान सर्ग आदि शब्दों के पय…
  28. Verses 39–42इस प्रकार सृष्टि के खरगोश के सींगवत्‌ अत्यन्त असंभावित सिद्ध होनेपर वह ब्रह्मरूपी ही है अ…
  29. Verses 43–48भाव, अभाव, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर सभी व्यभिचरित होते हैं, किन्तु नियति ब्र…
  30. Verse 49अविद्वान्‌ की दृष्टि मेँ अकारण ब्रह्म का सृष्टिरूप से भी भान होता है ओर उसी के प्रति यह क…
  31. Verses 50–51विवेकी पुरुष की दृष्टि में तो काकतालीय के समान स्थित इस सृष्टि में केवल पूर्वापरभाव का नि…
  32. Verses 52–77जैसे प्राणी के ओज में स्थित मैंने स्वप्न में सारी पृथिवी को डूबो रहे जलके संक्षोभ से प्रल…