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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 31–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 31–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 31-35

संस्कृत श्लोक

ग्रहग्रामार्णवाद्व्यब्धिवनव्योमाग्निका दिशः । तुहिनाहारहानन्तासंख्याम्बुदघटोद्भटान् ॥ ३१ ॥ शरद्ग्रीष्मवसन्तांश्च तापानातपदायिनः । तृणपत्रलतौघाभ्रराश्यूष्मपिहितावनीः ॥ ३२ ॥ सौवर्णमम्बरतलं भूतलं दिक्तटानि च । तप्तान्यदभ्रसरसीहिमशैलस्थलानि व ॥ ३३ ॥ रसानुरिक्ते वातेन जीव आपूर्यते यदा । ओजोन्तरणुमात्रात्मा तदा तत्रैव विन्दते ॥ ३४ ॥ वातविक्षुब्धसंवित्त्वादपूर्वं वसुधातलम् । अपूर्वा नगरग्रामशैलाब्धिवनमण्डलीः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रश्नोत्तर के सिलसिले में आत्मज्ञान का तत्त्त बतलाकर प्रस्तुत कथा का अवलम्बन करके पुनः कहते है। अपने अन्दर तीनों जगतो को धारण करनेवाला मैं उस प्राणी के तेजोधातु में (ओज में) प्रविष्ट होकर उस प्राणी के अन्तर्गत वासनामय जगत्‌ के अनुभव की तरह वैसे ही स्थित हुआ जैसे कि कमल के अंकुर में सूक्ष्म रूपसे स्थित भावी बीज अपने अन्दर होनेवाली हजारों विचित्रताओं को छिपाकर रहता हे । वहाँ मेरी अन्तरात्मा मेँ ही तदीय, मदीय ओर अन्यदीय सब वासनामय त्रिजगत्‌ प्रत्यकृचैतन्य में विकास को प्राप्त हुआ। उक्त जगद्रूप कुछ भी बाहर नहीं रहता, क्योकि उससे बाहर का प्रदेश ही अत्यन्त अप्रसिद्ध है । जब जहाँ जहाँ स्वप्न में चाहे जाग्रत में जो जगत्‌ का भान होता है वह बाह्य ओर आभ्यन्तर सहित दृश्य निज चिद्‌भान ही हे । जब स्वप्न में जन्तु के बिखरे हुए जगदानन्द का भान होता है वह आत्मरूप चिदणु का ही स्वप्नस्थानरूप से भान हे । व्याध ने कहा : भगवन्‌, यह जगत्‌ अकारण है तो इसकी सिद्धि कैसे है क्योकि अकारण खरगोश के सींग आदि की स्वरूप सिद्धि नहीं दिखाई देती। यदि जगत्‌ सकारण है तो स्वप्न में घटादि की सृष्टि में कारणभूत दण्ड, चक्र आदि के न रहने से सृष्टिबुद्धि किस कारण से होती हे, यों सन्देह में पड़े हुए व्याध का प्रश्न हे