Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 24–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
पवनस्पन्दसंशुष्ककिंशुकद्रुमशोभनाः ।
ज्वालालीरुज्ज्वलाम्भोजदलपल्लवपेलवाः ॥ २४ ॥
संतप्तसिकतासेकसनीहारसरिच्छिराः ।
दावानलशिखाश्यामधूमश्यामलदिङ्मुखाः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस उपपत्ति
से जैसे स्वप्न अथवा जैसे दर्पण में देखे गये मुख, वन, पर्वतादि अनन्य है वैसे ही चितृपरमाणु के अन्दर
स्थित विस्तारयुक्त यह जगत् चित्त से अभिन्न ही है। परमाणु के समान अत्यन्त सूक्ष्म, विस्तारयुक्त,
आदि, मध्य और अन्तरहित संविन्मात्र जो चिदाकाश है वही जगत् कहलाता है