Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
स्वेदमुष्णीकृताब्धिं वा स्विन्नं त्रैलोक्यमण्डलम् ।
क्षरत्क्षाराण्यरण्यानि प्रतर्दगहनान्यपि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चिन्मात्र मं ही भुवन स्थित है, 'त्वम्” (तुम)
"अहम्" (मैं) इत्यादि जगत् चिन्मय ही है, इस तरह गुरु, शास्त्र आदि द्वारा उक्त युक्तिसमूह से जन्य
ज्ञान से कभी उत्पन्न न हुआ जगत् परमाणु के अन्दर तक चला जाता है यानी अपनी स्थूलता का
परित्याग कर अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता हे