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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

श्रोत्रं त्वगीक्षणं घ्राणं जिह्वा चेतीहितात्मकः । संघातः प्रोच्यते जीवश्चिद्रूपोऽनिलमूर्तिमान् ॥ ६ ॥ सर्वत्र सर्वदा जीवः सर्वेन्द्रियमयः स्थितः । चिच्चिद्व्योमाव्ययस्तेन सर्वं सर्वत्र पश्यति ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हम लोगों का प्रसिद्ध यह जगत्‌ जैसा है वैसे ही आकाश में हजारों लाखों जगत्‌ अन्य मनुष्यों के हैं एसी आप संभावना कीजिये, किन्तु उनको परस्पर का अनुभव नहीं होता । तालाब में रहनेवाले, सागर में रहनेवाले ओर कुएँ मेँ रहनेवाले मेढकों का अपने अपने निवासभूत तालाब आदि में अन्योन्य का अनुभव देखा गया हे वे अपने आश्रय से अन्य दृश्यादि नियति का आपस में कहीं भी अनुभव नहीं करते हैं