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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

सपुष्पाः फेनहसनास्तरलातरलेक्षणाः । विलासेनाम्बुधिं यान्ति सरितो मत्तयौवनाः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जगत्‌ के संस्कारों को धारण करनेवाली बुद्धि का ही परिणाम जगत्‌ है तो संकल्प-पदार्थ अनुभव स्मृति ही होगे, इसपर कहते हैं। संकल्पपदार्थअनुभव यद्यपि पूर्वदृष्ट पदार्थो के तुल्य हैं तथापि उनकी स्मृति ही अपूर्वं होने से यानी पूर्वानुभूत तत्तांश के त्याग से स्वप्न होती है मगर अपनी मृत्यु के अनुभव आदि इस जन्म में अनुभूत होते हुए भी अन्य जन्मों में अनुभूत ही है, इसलिए वे उनके संस्कार से युक्त बुद्धि में अध्यस्त होते हैं, यह उनमें विशेषता है