Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पुष्पाभ्रप्रतिधानानि परिगीतानि षट्पदैः ।
वसन्तान्तःपुराण्यन्तरुद्यानान्युदितानि खे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चित् का चमत्काररूप दृश्य स्वात्मा के निज अंगों की तरह अभिन्न हे । (अद्वितीय है) एक
की दृष्टि में साकार भी वह दूसरे की दृष्टि मे निराकार है । एककी ही दृष्टि में एक समय साकार भी वह
अन्य काल में निराकार है । तात्त्विक दृष्टि से वह सदा ही निराकार है । इसी प्रकार एककी दृष्टि में
सकारण (कारणसहित) भी यह अन्य की दृष्टि मेँ अकारण ही है । एककी ही दृष्टि में एक काल में
सकारण भी अन्य काल में अकारण है । वास्तव में यह अकारण ही है