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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

श्लेष्मात्मना रसेनान्तर्जीव आपूर्यते यदा । तेऽक्षाणुकेऽणुरूपात्मा तदा तत्रैव विन्दति ॥ ८ ॥ क्षीरार्णव इवोड्डीनो नभश्चन्द्रोदयान्वितम् । सरांसि फुल्लपद्मानि कह्लारवलितानि च ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे एक नगर में सैकड़ों स्वप्ननगरों का भान होता है और नहीं भी होता वैसे ही आकाश में जगतां का भान होता है ओर नहीं भी होता । किन्हीं के (अज्ञानियों के) अनुभव में आने से वे हैं और किन्हीं के (ज्ञानियों के) अनुभव में न आने से नहीं हे । जैसे सैकड़ों लोगों के स्वप्न- नगर एक घर में विकसित होते हैं ओर नहीं भी होते इसी प्रकार आकाश में जगत्‌ हैं भी और नहीं भी हैँ