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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 39–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 39–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 39-42

संस्कृत श्लोक

अन्धकूपे निपतितं विपुले संकटेऽथवा । अथवा रूढमात्मानं खमाभं पादपं गिरिम् ॥ ३९ ॥ वात्पित्तश्लेष्मयुक्तो जीव आपूर्यते यदा । भागैर्वातवशं प्राप्तैरार्तोऽसौ विन्दते तदा ॥ ४० ॥ पतन्तीं पार्वतीं वृष्टिं सुशिलावृष्टिसंकटम् । स्फुटाट्टकटकारावभ्रमत्पादपमण्डलम् ॥ ४१ ॥ भ्रमद्भिर्वनविन्यासैः संदिग्धाम्भोधरोत्कटम् । सिंहवारणवर्षाभ्रनिरन्तरदिगन्तरम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सृष्टि के खरगोश के सींगवत्‌ अत्यन्त असंभावित सिद्ध होनेपर वह ब्रह्मरूपी ही है अनानारूप (अद्वितरूप) उसमें परमात्मा के मायाप्रतिविम्ब चैतन्य में नित्य आत्मा के ओपाधिक अवयवरूप से नानात्व (द्वैत) अत्यन्त अयुक्त हे । ब्रह्मरूप होने पर अब्रह्मरूपी निराकार होनेपर भी साकार रूपसे बेरोकटोक प्रतिभास होनेपर निराकार वह ब्रह्म ही चिद्रूप होने से प्रकट शरीरवाला साकार सा स्वरूप धारण कर देवर्षि, मुनि आदि स्थावर जंगमरूप जगत्‌ को रचता है ओर क्रमसे सम्पूर्ण नियति, विधि, निषेध, देश, काल, क्रिया आदि करता है