Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 43–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, verses 43–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 43-48
संस्कृत श्लोक
तालीतमालहिंतालमालाज्वलनसंकुलम् ।
गुहाघुंघुमनिर्ह्रादभांकारघनघर्घरम् ॥ ४३ ॥
मन्द्रमन्दरमन्थानशब्दसंदर्भसुन्दरीम् ।
दरीं दलनदुर्वारमिथःसंघट्टघट्टिताम् ॥ ४४ ॥
श्रृङ्गसंघट्टसदृशाः क्रेंकारोत्करकर्कशाः ।
नदीर्मुक्तालतापातसस्रग्दामनभस्तलाः ॥ ४५ ॥
शिलाशकलपूर्णार्णपूर्णाम्बरमहार्णवम् ।
वहद्वनघनोद्धातघट्टितब्रह्ममण्डलम् ॥ ४६ ॥
परस्परविनिर्मृष्टदशदर्शनदन्तुरम् ।
चटत्कटकटारावस्फुटत्कटकटङ्कितम् ॥ ४७ ॥
खपातपवनाधूतवनवातलतोदयम् ।
रणदात्मदृषच्चूर्णकर्बुराम्बुजधारिणम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
भाव, अभाव, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर सभी व्यभिचरित
होते हैं, किन्तु नियति ब्रह्मकृत होने के कारण सर्वस्तिमयरूप मोक्ष तक कभी व्यभिचरित नहीं होती ।
जब से नियति कल्पना हुई तब से लेकर नियतिविशेषरूप कार्य-कारणता के बिना पदार्थो का वैसे ही
संभव नहीं है जैसे कि बालू से तेल का संभव नहीं हे । नियति ओर नायक (भोक्ता जीव) ये दोनों, जो
कि ब्रह्मा के दो हाथों की तरह अंगभूत हैं, ब्रह्म से अपने आप प्रवृत्त हुए हँ । ब्रह्म अपने अंगभूत एक से
दूसरे का, एक हाथ से दूसरे हाथ की तरह, नियन्त्रण करता हे । अतएव जीव का इसी तरह जाग्रत् तथा
स्वप्नरूप सर्ग (सृष्टि) अबुद्धिपूर्वक तथा अनिच्छा से काकतालीय न्याय के तुल्य वैसे ही होता है, जैसे
कि स्पन्दवश जल में बिना किसी प्रयत्न और इच्छा के आवर्त (भँवर) विशेष ढंग से उत्पन्न होते हे ।
कार्य में कारण से उत्पन्न संगठन का नियम ही नियति हे, उक्त संगठन नियम के बिना अज्ञात ब्रह्म वैसे
ही क्षणभर भी नहीं टिक सकता जैसे कि मिट्टी, चूर्ण, पिण्ड, घट, कपाल आदि में से किसी एक रूपरेखा
के बिना नहीं टिक सकता, उक्त रूपरेखा धारण, जिसका ज्ञान से सर्वात्मितारूप आत्यन्तिक विनाश
होता है, मोक्ष तक रहता ह । इस प्रकार यानी नियति की कल्पना से सदा सारा दुश्यमण्डल सकारण
उसी के प्रति है, जिसके प्रति जिस काल से नियति जिसकी सृष्टि में प्रवृत्त हुई अन्य पुरुष के लिए ओर
अन्य काल मेँ होनेवाले पदार्थ के लिए नहीं है