Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 115
एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सो चौदहवाँ सर्ग॑ पार्श्ववर्ती द्वारा विपाश्चितों के दशयि गये वन, वृक्ष, सागर, शैल और वनचरो का वर्णन।
34 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, इसके पश्चात् विपश्चितो के पार्श्ववर्ती मन्त्…
- Verse 2महाराज ! तलहटी, मध्यभाग तथा चोटी के क्रम से आगे पाषाणमयता को प्राप्त (अत्यन्त पथरीले) इस…
- Verse 3देव, मौलसिरी, केसर, नारियल के वृक्षों से भरी हुई इन वनस्थलियों पर भी कृपया दृष्टिपात कीजि…
- Verse 4यह महासागर लहरीरूपी हंसियों से तराई को (पर्वत के पास की सम भूमि को) और पर्वत पर शोभित शिल…
- Verse 5जैसे कोई बालक अपने घर की धूम्र -पंक्तियों को पंखे से कम्पित करता है वैसे ही यह सागर वायु…
- Verse 6पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय के समय वृद्धि को प्राप्त समुद्र के प्रवाहो से जिनकी शाखाओं में…
- Verse 7हैं
- Verse 8यह ऋक्षवान् नाम का पर्वत लहरों में उलझे हुए मगरो को अपने ग्रसनेवाले सफेद पत्थररूपी दाँतो…
- Verse 9जैसे बलवान् युद्ध -कुशल योद्धा शत्रुओं को जड़ वचनो से ललकारता है वैसे ही यह महेन्द्र पर्…
- Verse 10चन्दन के वृक्षो से व्याप्त, अतिशय शोभाशाली, अति उन्नत यह मलय पर्वत -रूपी मल्ल (पहलवान) प्…
- Verse 11चारों ओर से रत्न-मिश्रित तरगों से निरन्तर व्याप्त समुद्र को आकाशचारी जीव, भूमि के रत्नकंक…
- Verse 12वनसमूहों से भरे हुए छोटे-छोटे पर्वत, जिनके शिखरो पर रत्न विराजमान हैं वायुवश वन के कम्पित…
- Verse 13तरगों के शिखरो पर घूम रहे समुद्री मगर और जंगली हाथी तरंगशिखरों के निकलने ओर प्रविष्ट होने…
- Verse 14उनमें से एक हाथी भाग्यवश अगाध जल में भँवरों की पकड़ में आकर जलकणों की मूसलाधार बौछारों से…
- Verse 15जैसे सागर विविध प्राणियों से पूर्ण, जल से भरे हुए तथा पर्वतों से ऊँचे नीचे विषम हैं वैसे…
- Verses 16–17जैसे ब्रह्म अपने से अभिन्न होते हुए भी भिन्न से प्रतीत होनेवाले, दिखाई देते हुए भी असद्रू…
- Verses 18–20जैसे इन्द्र असुरों से रक्षा करते हुए मणियों को अपने अन्दर रखते हैं वैसे ही मन्थन के समय द…
- Verse 21जैसे यात्रा में लोगों का कलकल ध्वनि से युक्त परस्पर समागम होता है वैसे ही विविध दिशाओं और…
- Verse 22युद्ध में उत्साह रखनेवालों में जलचर ही श्रेष्ठतम होते हैं, ऐसा मेरा तर्क है, क्योंकि पूर्…
- Verse 23रतिखेद से श्रान्त हुई मछलियों के लहरों की चोटियों पर नाचने में जो आवर्तो का सा (जलभ्रमियो…
- Verse 24नदीरूपी मोतियों की मालाओं के बीच-बीच में गे हुए मेघरूपी उत्तमोत्तम चंचल रत्न सागर के कण्ठ…
- Verse 25महेन्द्र पर्वत की अरतिकारिणी (उदास) भूमियों में पहुँचकर उनमें अभिरुचि न होने से गुहारूपी…
- Verse 26यह मन्दराचल पर्वत कन्दराओं से निकले हुए वायु के झोकों से आकाश में पुष्पवर्षी मेघो का विस्…
- Verse 27ये बिजलीरूपी चंचल नेत्रवाले मेघरूपी हरिण आम, धूलिकदम्ब और कदम्बो से परिपूर्णं गन्धमादन की…
- Verse 28हिमालय की गुफाओं से निकले हुए, मेघो और समुद्र की तरंगों को छिन्न- भिन्न करनेवाले तथा लताओ…
- Verse 29हे देव, आम ओर कदम्ब की शाखाओं की चोटियों के सम्पर्कं से सुगन्धवाले गन्धमादन पर्वत के ये व…
- Verse 30अलकापुरी (कुबेरनगरी) के अलक (बालों की जुल्फै) बने हुए मेघो को वेष्टित कर रहा तथा वनश्रेणि…
- Verse 31कुन्द ओर मन्दार (पारिजात) की पुष्पराशियों की सुमधुर सुगन्धि के भार से मन्दगति वाले अतएव त…
- Verse 32नारियल वृक्षों तथा मल्लिका आदि लताओं को नचाने से क्रमशः उनकी तीक्षण मद्यगन्ध ओर सुगन्ध को…
- Verse 33भगवान् शिवजी के विकसित प्रमदवन के केले के कर्पूर से सुरभित, मेघो को कपा रहे ओर कैलास के…
- Verse 34गजेन्द्रो के गण्डस्थल से चू रहे मदजल से मन्थर मूर्तिवाले ये विन्धयाचल के तोतों के साथ निक…
- Verse 35शबरियों के शरीरो में वस्त्रं की कल्पना द्वारा जीर्णशीर्ण पत्तों के ढेरवाले मलयाचल पर्वतपर…
- Verse 36ये दिशारए जिनके सागर, पर्वत, नदियाँ, मेघ, वनपंक्तियाँ अवयव हैं, आपके प्रताप से परिपुष्ट ह…
- Verses 37–56इस प्रदेश में पर्वत तथा वनवीथियों के समीप रति के लिए विद्याधरो द्वारा रची गई पुष्पशय्याएँ…