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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

पार्श्वगा ऊचुः । अत्रोत्तमाशथ लतावलयालयेषु लीलाविलोलललनाः कलयन्ति गीतम् । उद्दामभावरसविस्मृतवासरेहा विश्रम्य किंनरगणाः कलकाकलीकम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, इसके पश्चात्‌ विपश्चितो के पार्श्ववर्ती मन्त्री आदि ने वहाँ पहुँचने के बाद वहाँपर भाँति-भाँति के वन, वृक्ष, सागर, पर्वत, मेघ और वनेचर कौतुक के लिए विपश्चितो को दिखलाये

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सो चौदहवाँ सर्ग॑ पार्श्ववर्ती द्वारा विपाश्चितों के दशयि गये वन, वृक्ष, सागर, शैल और वनचरो का वर्णन।