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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

दशाशाः शैलानामुपरि परितः प्रावृतघना घनश्यामाकाराः खगकलकलालापलपिताः । लतामुक्तैः पुष्पैर्ललितवनलेखाभुजलता हसन्त्यस्ते राजन्भवनवनिता भान्ति पुरतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यह महासागर लहरीरूपी हंसियों से तराई को (पर्वत के पास की सम भूमि को) और पर्वत पर शोभित शिलाओं को काटता है ओर चोटी से लेकर जड़ तक फलों ओर पल्लवं से लदी हुई वनपंक्तियों को भी काटता है