Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
वंशानां हृदि पर्वतेषु जलधौ तोयार्थिनीनां तु ये शुक्तीनां हृदये विशन्ति समये वर्षांभसां बिन्दवः ।
ते मुक्ताफलतां व्रजन्ति करिणां कुम्भेषु वान्यद्भवेत् शुद्धौ मौक्तिकवत्स्युरुत्तमगुणा एतास्त्रिधा जातयः ॥ १६ ॥
शैलेऽब्धौ पुरुषेऽवनौ जलधरे भेके शिलायां गजे नानाकारधरा भवन्ति मणयः कर्माणि तेषां विभो ।
ह्लादोच्चाटनमारणज्वरभयभ्रान्तिप्रकाशान्धताखेदोत्तापनभूनभोगतिदृशो नाशो विधानं तथा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे ब्रह्म अपने से अभिन्न होते हुए भी भिन्न से प्रतीत होनेवाले, दिखाई देते
हुए भी असद्रूप, जड़ होते हुए भी चलनेवाले, शान्त होते हुए असीम जगत् को धारण करता
है वैसे ही जलधि अपने से अभिन्न होते हुए भी भिन्न से मालुम पड़नेवाले दिखाई देते हुए
भी चंचल, विनाशशील होते हुए भी अन्त रहित असीम आवर्तो को धारण करता है