Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
क्वचित्कुसुमगन्धयः कमलवर्गगन्धाः क्वचित्क्वचितकुसुमवर्षिणो ललितकेसरासारिणः ।
क्वचिच्च हिमपाण्डवो हरितपीतलश्यामला वहन्ति शिखरानिलाः सुरतमन्दघर्मच्छिदः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
अलकापुरी (कुबेरनगरी) के अलक (बालों
की जुल्फै) बने हुए मेघो को वेष्टित कर रहा तथा वनश्रेणियों में पुष्पमेव की रचना कर रहा
वायु इधर ही आ रहा है